Friday, November 11, 2022

Friday, March 12, 2021

Reactivating my blog

 I was not writing on this blog of mine as it was not available. Some how I could recover it today itself so decided to  be active on this blog again.

Friday, June 27, 2014

आसान है दिल्ली विश्वविद्यालय विवाद का हल.

 

 

हमारे देश में किसी भी मामले को विवादित बनाने और उस विवाद की आड़ में विभिन्न राजनीतिक दलों व विचारधाराओं के अनुयायियों द्वारा अपना हित साधने की अंतहीन कोशिश जारी रखना एक परम्परा बन गयी है.कभी सामान्य से मामलों को अवांछित जिद,प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर व अपने अपने अहम की तुष्टि हेतु इतना तूल दिया जाता है कि प्रभावित पक्ष के हितों को भी ताक पर रख दिया जाता है. समाज को उचित दिशा देने हेतु सर्वाधिक जिम्मेदार तथाकथित बुद्धिजीवी भी इसी मानसिकता के अधिक शिकार देखे गए हैं.बुद्धिजीवी वर्ग भी खेमों में बंटा हुआ है तथा वह भी अपनी राजनीतिक विचार धारा के अनुसार किसी भी मुद्दे का आँख मूँद कर समर्थन या विरोध करने लग जाता है. क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सार्वजनिक हित के मुद्दों पर आपसी मतभेद, व्यर्थ की जिद व टकराव को छोड़कर एक साथ मिल बैठ कर सामंजस्य से ऎसी नीति बनायी जाए जो देश के हर वर्ग के लिए लाभदायक हो तथा राष्ट्र की प्रगति में सहायक हो ? क्या किसी भी सरकार या संस्था के किसी भी निर्णय का बिना गुण दोष को जाँचे परखे इस आधार पर समर्थन या विरोध किया जाना आवश्यक है कि निर्णय लेने वाली सरकार या संस्था की विचारधारा से हमारी विचारधारा मेल खाती है या नहीं ? क्या ऐसे समर्थन या विरोध के समय समाज व देश के हित को सर्वोपरि नहीं रखा जाना चाहिए ? यदि किसी भी जटिल से जटिल समस्या का ईमानदारी व दृढ़ संकल्प से समाधान निकालने का प्रयास किया जाए तो कुछ भी असंभव नही है और आपसी बातचीत से हर जटिल समस्या का सुगम व सर्वमान्य हल निकाला जा सकता है.


ताजा विवाद दिल्ली यूनिवर्सिटी के चार वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम से उत्पन्न हुआ है जहां यूजीसी और त्रि-वर्षीय डिग्री पाठ्यक्रम के समर्थकों का बड़ा वर्ग और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति व कार्य परिषद के चार वर्षीय पाठ्यक्रम के समर्थक एक दूसरे के आमने सामने हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय शिक्षक संघ का एक बड़ा वर्ग व विभिन्न छात्र संगठन जहां त्रि-वर्षीय पाठ्यक्रम व यूजीसी के निर्देश के पक्ष में हैं तो वहीं दूसरी तरफ चार वर्षीय पाठ्यक्रम के समर्थक इसे विश्वविद्यालय की स्वायत्तता व अस्मिता से जोड़ कर देख रहे हैं तथा यूजीसी के किसी भी निर्देश को विश्वविद्यालय की स्वायत्तता में हस्तक्षेप मान रहे हैं. दोनों पक्ष कुछ हद तक अपनी अपनी मान्यताओं के बारे में सही हो सकते हैं लेकिन दोनों की आपसी लड़ाई में सर्वाधिक नुकसान छात्रों का ही हो रहा है वह भी उन छात्रों का जो सुदूर स्थानों से दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न कालेजों में प्रवेश के लिए आये हुए हैं.


देश में किसी भी विश्वविद्यालय या उच्च शिक्षा संस्थान की स्थापना विश्वविद्यालयअनुदान आयोग अधिनियम के प्रावधानों के अधीन होती है तथा विश्वविद्यालय स्थापना के बाद अपने नियम,परिनियम आदि बनाता है जिनके अनुरूप ही विश्वविद्यालय का प्रशासन चलता है. यूजीसी उच्च शिक्षा के क्षेत्र में देश की सर्वोच्च संस्था है तथा समस्त विश्वविद्यालयों को आर्थिक अनुदान प्रदान करती है. यूजीसी एक्ट में स्पष्ट प्रावधान है कि विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों को यूजीसी द्वारा समय समय पर जारी अधिसूचनाओं आदि के अनुसार अपने नियमों,परिनियमों आदि में संशोधन कर तदनुसार कार्यवाही करनी पड़ेगी तथा ऐसा न किये जाने की स्थिति में यूजीसी द्वारा उक्त विश्वविद्यालय को आर्थिक अनुदान देना समाप्त किया जा सकेगा तथा यदि यूजीसी अपनी उच्चाधिकार प्राप्त समितियों के माध्यम से जांच व समीक्षा के आधार पर यह पाती है कि विश्वविद्यालय या संस्थान द्वारा उसकी अधिसूचनाओं या मार्गदर्शी निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है तो ऐसे विश्वविद्यालय या संस्थान की मान्यता भी रद्द की जा सकती है. शायद ही देश का ऐसा कोई अनुदान प्राप्त विश्वविद्यालय हो जो यूजीसी से आर्थिक अनुदान प्राप्त किये बिना ही स्वयं के स्त्रोतों से संचालित हो सके. यदि यूजीसी से अनुदान प्राप्त न हो तो अधो संरचना को तो छोड़ ही दीजिये शिक्षकों व अन्य कर्मचारियों का वेतन भुगतान भी करना संभव न होगा. यूजीसी सर्वोपरि है या विश्वविद्यालय की स्वायत्तता यह बहुत लम्बी बहस का मुद्दा है तथा इसका समाधान खोजने तक शायद पूरा शैक्षणिक सत्र ही निकल जाए. यह सत्य है कि वर्तमान में राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 10+2+3 की प्रणाली चल रही है तथा प्रथम डिग्री पाठ्यक्रम(त्रिवर्षीय या चार वर्षीय) में प्रवेश हेतु 10+2 उत्तीर्ण होना आवश्यक है. देश के अधिकाँश विश्वविद्यालयों में त्रिवर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू है जो गत सत्र से पूर्व दिल्ली विश्वविद्यालय में भी समान रूप से लागू था. कुछ विश्वविद्यालयों में चार वर्षीय पाठ्यक्रम वाला (स्नातक आनर्स) पाठ्यक्रम भी बहुत पहले से लागू है.यह भी सत्य है कि किसी भी उच्च शिक्षण संस्था को अपने पाठ्यक्रमों में फेरबदल करने हेतु कई औपचारिकताएं पूर्ण करने के बाद विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से पूर्वानुमति लेना आवश्यक है तथा दिल्ली विश्वविद्यालय अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार नया पाठ्यक्रम प्रारम्भ करने से पूर्व विजिटर (दिल्ली विश्वविद्यालय के मामले में महामहिम राष्ट्रपति) की पूर्वानुमति आवश्यक है. दिल्ली विश्वविद्यालय ने चार वर्षीय पाठ्यक्रम शुरू करनेसे पहले विभिन्न औपचारिकताएं पूरी कीं या नहीं या फिर यह पाठ्यक्रम बिना औपचारिकताएं पूर्ण किये ही गत सत्र में अचानक लागू कर दिया गया यह जांच का विषय हो सकता है परन्तु वर्तमान विवाद उन छात्रों के फायदे व नुकसान से जुडा हुआ है जो गत सत्र में चार वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश ले चुके हैं तथा वर्तमान में विश्वविद्यालय में प्रवेश लेने का इंतजार कर रहे हैं.ऐसे में छात्र हित को ध्यान में रखते हुए सभी पहलुओं पर निम्नानुसार विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है.


1)  देश के सर्वाधिक विश्वविद्यालयों यहाँ तक कि केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में तीन वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम लागू है और सफलतापूर्वक चल रहा है.

2)  सारे देश में स्नातकोत्तर कक्षाओं में प्रवेश हेतु स्नातक की डिग्री अनिवार्य है,ऐसे में जो छात्र चार वर्षीय स्नातक डिग्री के आधार पर स्नातकोत्तर कक्षाओं में   प्रवेश लेना चाहेंगे उन्हें एक वर्ष अधिक इन्तजार करना पडेगा.

3) वर्तमान में केंद्र की सिविल सर्विसेस व राज्य स्तरीय परीक्षाओं में न्यूनतम योग्यता स्नातक उपाधि है , ऐसे में चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने वाले छात्रों को नौकरी की तलाश में एक वर्ष अधिक इन्तजार करना होगा और उनके रोजगार के अवसर कम होंगे.

4) कई अन्य ऐसे रोजगार के क्षेत्र हैं जहां न्यूनतम वांछित योग्यता स्नातक या स्नातकोत्तर होती है,वहां भी चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम से उत्तीर्ण छात्रों को आवेदन करने पात्र होने हेतु एक वर्ष का नुकसान होगा.

5) इसी प्रकार का नुकसान उन छात्रों को उठाना पडेगा जो स्नातकोत्तर के बाद शोध पाठ्यक्रमों एम्.फिल या पीएचडी में प्रवेश के इच्छुक होंगे या फिर नेट या स्लेट की परीक्षाओं में सम्मिलित होना चाहते हैं.क्योंकि वर्तमान में इन पाठ्यक्रमों में प्रवेश हेतु न्यूनतम योग्यता स्नातकोत्तर उपाधि है.

6) अधिकांश कालेजों व विश्वविद्यालयों में प्रवेश लेने वाले छात्रों में अधिकतम संख्या उन छात्रों की होती है जो निम्न,निम्न-मध्यम या मध्यम आर्थिक पृष्ठभूमि वाले परिवारों से आते हैं,ऐसे में चार वर्षीयपाठ्यक्रम पूर्ण करने के लिए इन वर्गों के छात्रों को अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाना पडेगा.

7) अब प्रश्न उठता है कि जिन छात्रों को गत सत्र में चार वर्षीय पाठ्यक्रमों में प्रवेश दे दिया गया है उनका क्या होगा. इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि विगत वर्षों में भी कई विश्वविद्यालयों की मान्यताएं विभिन्न कारणों से निरस्त की गयीं थीं और उनमें अध्ययनरत छात्रों को विभिन्न राज्यों में पूर्व से ही विधिवत चल रहे विश्वविद्यालयों में समायोजित किया गयाहै.यहाँ भी ऐसा किया जा सकता है.


       अंतिम व महत्वपूर्ण प्रश्न है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के चार वर्षीय स्नातक पाठ्यक्रम के पक्षधरों को कैसे संतुष्ट किया जा सकता है ? इस सम्बन्ध में यदि दिल्ली विश्वविद्यालय अपने उच्च मानदंड स्थापित करने के उद्देश्य से ही चार वर्षीय पाठ्यक्रम लागू करना चाहता है तथा छात्रों का एक वर्ग ऐसे पाठ्यक्रम में प्रवेश लेने का इच्छुक है तो दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा एक साथ दो पाठ्यक्रम शुरू किये जा सकते हैं. 

दिल्ली विश्वविद्यालय त्रिवर्षीय पाठ्यक्रम के साथ साथ पृथक से एक चार वर्षीय स्नातक (आनर्स) पाठ्यक्रम शुरू कर सकता है और उसके लिए सभी निर्धारित प्रक्रियाएं व औपचारिकताएं पूर्ण करे ताकि भविष्य में कोई विवाद उत्पन्न न हो.


ऎसी स्थिति में छात्रों के पास स्वेच्छानुसार त्रिवर्षीय या चार वर्षीय पाठ्यक्रम चुनने का विकल्प होगा.


वर्तमान में जो सीटें स्नातक पाठ्यक्रम में उपलब्ध हैं उनका कुछ प्रतिशत लगभग 25% चार वर्षीय पाठ्यक्रम हेतु निर्धारित किया जा सकता है तथा आने वाले वर्षों में अधोसंरचना,शैक्षणिक आदि स्टाफ की समुचित व्यवस्था कर ये सीटें आवश्यकता व उपयुक्तता अनुसार बढ़ाई जा सकतीं हैं.

जो छात्र विगत वर्ष चार वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रवेश ले चुके हैं उन्हें भी विकल्प प्रदान किया जाये कि वे तीन वर्षीय पाठ्यक्रम में जाना पसंद करेंगे या फिर चार वर्षीय पाठ्यक्रम जारी रखना चाहेंगे.


यदि दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन,यू जीसी व अन्य सम्बन्धित पक्ष अपने अड़ियल रुख को त्याग कर इस फार्मूले पर विचार कर सहमत हों तो एक आसान व सम्मानजनक सर्वमान्य हल निकल सकता है.

Tuesday, January 7, 2014

क्या आम आदमी पार्टी की नयी तरह की राजनीति का प्रयोग वास्तव में एकदम नया व अनूठा है ?

आम आदमी पार्टी जिस तरह जनलोकपाल आन्दोलन से उपज कर राजनीति में आई, उसने नयी तरह की राजनीति की शुरूआत करने का दावा किया और मीडिया ने उनके राजनीति करने के तथाकथित नए ढंग को जिस तरह से प्रचारित किया उसे देख कर आम जनता को यह अनुभूति होना स्वाभाविक है कि यह अपनी तरह की एक नयी पहल है. इस सम्बन्ध में सबसे पहले यह समझना पड़ेगा कि इस पार्टी के संस्थापकों की मूल विचारधारा क्या है ? क्या ये लोग किसी ख़ास विचार धारा से जुड़े लोग हैं या फिर"कहीं की ईँट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनबा जोड़ा" वाली बात है ?
दरअसल पूरे देश में बहुत बड़ी संख्या में लोग वर्तमान सड़ी गली राजनीतिक व्यवस्था से तंग आ चुके  हैं और जनता का बहुत बड़ा वर्ग व्यवस्था परिवर्तन की चाह रखता है. आये दिन रोजमर्रा के कामों से लेकर बड़े बड़े सौदों में बढ़ते भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों के ऊपर किसी तरह की लगाम न लगा पाने के कारण भ्रष्टाचार पर प्रभावी अंकुश लगा सकने वाले क़ानून कीआवश्यकता महसूस की गयी.इस प्रयोजन से सिविल सोसायटी के कुछ सदस्यों ने मिलकर जनलोकपाल जैसे एक क़ानून का खाका तैयार किया और प्रसिद्ध समाज सेवी अन्ना हजारे के चेहरे को सामने रख एक देशव्यापी आन्दोलन चलाया.  अन्ना हजारे के आन्दोलन को पूरे देश में जिस तरह का समर्थन मिला वह अभूतपूर्व था. शुरूआत में तो ऐसे संकेत  भी मिले कि जनलोकपाल क़ानून को संसद की स्वीकृति मिल जायेगी पर राजनीतिक दलों के अंतर्विरोध के कारण हर बार यह जनलोकपाल बिल किसी न किसी कारण से पारित नहीं  हो सका.
अन्ना केआन्दोलन से समाज के हर विचारधारा के लोग जुड़े थे. इस आन्दोलन में ऐसे लोग भी थे जिनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएँ भी थीं जो किन्हीं कारणों से पूरी नहीं हो पायीं थीं. विभिन्न राजनीतिक संगठनों से जुड़े ऐसे लोग भी इस आन्दोलन में सम्मिलित थे जो अपने दलों में हाशिये  पर आ गए थे. आन्दोलन को मिले देशव्यापी जन समर्थन से कुछ लोगों को लगा कि  इस आन्दोलन का लाभ लेकर वे व्यवस्था परिवर्तन कर सकते हैं और उनकी इसी  इच्छा ने आन्दोलन को किसी सफल परिणिति की ओर न पहुँचते देख एक नयी राजनीतिक पार्टी का गठन कर डाला,जिसे अत्यधिक विचार मनन के बाद आम आदमी पार्टी नाम दिया. इस पार्टी का संयोजक एक ईमानदार,संघर्षशील व स्वच्छ छवि वाले गैर राजनीतिक व्यक्ति श्री अरविन्द केजरीवाल को बनाया गया. मानाजाता है कि अन्ना हजारे के पूरे आन्दोलन के पीछे अरविन्द केजरीवाल ने ही मुख्य रणनीतिकार की भूमिका निभाई थी.
आम आदमी पार्टी के संस्थापकों ने बड़ी ही कुशलता से दिल्ली विधान सभा चुनाव के ठीक एक वर्ष पूर्व पूरी रणनीति के अनुसार अपनी पार्टी  को दिल्ली विधान सभा के चुनावों में उतारने के उद्देश्य से गठित किया और उसके कार्यक्रम चलाये. दिल्लीविधानसभा के चुनावों  से ही अपनी पार्टी की चुनावी राजनीति की शुरूआत करने के पीछे इन लोगों का उद्देश्य साफ़ था कि  दिल्ली देश की राजधानी होने के कारण वहां पर होने वाली राजनीतिक गतिविधियों को  पूरे देश में किसी भी अन्य स्थान की अपेक्षा अधिक प्रचार प्रसार मिलेगा. वैसे भी अन्ना व रामदेव के बड़े आन्दोलनों का केंद्र बिंदु दिल्ली ही थे. कामन वैल्थ घोटाला, 2 जी घोटाला आदि के कारण दिल्ली हमेशा सुर्ख़ियों में बनी रही. इसी बीच १६ दिसंबर २०१२ की दिल्ली गैंगरेप की घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया और दिल्ली एक बार फिर स्व स्फूर्त जन आन्दोलनों का केंद्र बन गई थी. बढ़ती हुई महंगाई व भ्रष्टाचार से तो पूरे देश की जनता त्रस्त थी ही, फिर बिजली -पानी की समस्याओं की वजह से दिल्ली वासियों का जीना दूभर हो गया था तथा उनका आक्रोश शीला सरकार के प्रति बढ़ता ही गया.बिजली-पानी की समस्याओं को  लेकर आम आदमी पार्टी के धरना प्रदर्शनों के कारण आम आदमी पार्टी दिल्ली में तो लोकप्रिय हुई ही साथ ही पूरे देश में इसकी पहचान बन गयी.
आम आदमी पार्टी ने जिस तरह कम खर्चे में जनता के बीच जा कर अपना प्रचार किया उसे भले ही आम जनता ने व मीडिया ने नया तरह का प्रयोग माना हो परन्तु छात्र जीवन में या बाद में जो लोग जनवादी आन्दोलनों का हिस्सा रह चुके हैं या जिन्होंने दूर से उन आन्दोलनों को देखा हो उन्हें आम आदमी पार्टी की कार्य शैली में बहुत नया पन देखने को नहीं मिला होगा, न ही उन्हें इनके कार्य करने के ढंग पर कोई आश्चर्य ही हुआ होगा. घर घर जा कर प्रचार करना,नुक्कड़ नाटकों,छोटी छोटी सभाओं व हस्तनिर्मित बैनरों-पोस्टरों से प्रचार करने की उनकी यह नीति जनवादी संगठनों में हमेशा से चली आयी है. उसका कारण भी है कि उन संगठनों के पास अन्य बड़े राजनीतिक संगठनों की तरह पानी की तरह बहाने हेतु धन का अभाव भी रहता है. भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने वाले क़ानून का नाम जनलोकपाल रखने से ही यह अहसास हो चुका था कि इस आन्दोलन के पीछे कहीं न कहीं अतीत में जनवादी संगठनों या उनकी विचारधाराओं से जुड़े हुए लोगों का मस्तिष्क कार्य कर रहा है. आज भी यदि देखा जाये तो जितने भी लोग इस आम आदमी पार्टी में मूल रूप से जुड़े हुए हैं उन में से अधिकाँश की पृष्ठ भूमि या तो धुर वामपंथी या समाजवादी संगठनों की रही है.विज्ञान व तकनीक के आधुनिक काल में इन लोगों ने अपनी जनवादी सोच को  ही कुछ परिष्कृत कर प्रदर्शित करने का प्रयासकिया है.
अंत में  जिस प्रकार आम आदमी पार्टी कांग्रेस के समर्थन के बाद कांग्रेस से अपनी 18 शर्तों वाली चिट्ठी का जवाब पाने के बाद जनता के बीच गयी और इन्होंने जनता से सोसल मीडिया,एसएमएस के जरिये प्रतिक्रियाएं प्राप्त कीं औरदिल्ली के विभिन्न वार्डों में जा कर जन सभाएं कीं वह भी कोई नयी बात नहीं थी. सोसल मीडिया और इलेक्ट्रोनिक माध्यमों का प्रयोग तो ये लोग जनलोकपाल के आन्दोलन के समय से ही करते आ रहे थे.रही बात सभाओं में व्यक्तियों से हाथ खडा करवा  के उनकी सहमति या असहमति जानने की तो भले ही मीडिया ने यह प्रचारित किया हो कि यह नया तरीका है, मुझे इसमें कुछ भी नया नहीं लगा.जिसने भी पिछले कुछ महीनों की भाजपा के प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार श्री नरेन्द्र मोदी की सभाओं पर गौर किया हो उन्होंने देखा होगा कि वे लगभग हर सभा में मंच से अपने कुछ प्रश्नों के उत्तर के लिए लोगों की सहमति व असहमति प्रकट करवाने के लिए हाथ उठवातेहैं. यद्यपि उन सभाओं में अधिकाधिक भीड़ के कारण न तो उठे हुए हाथों को गिना जा सकता है न ही उसे किसी आंकड़े के रूप में प्रस्तुत करने की कोई आवश्यकता ही रहती है.
एक अन्य रूप में भी जन सभाओं और जन अदालतों का प्रचलन हमारे देश में प्रचलित है.छत्तीसगढ़ व अन्य राज्यों के नक्सली संगठन अक्सर जनसभाएं व जन अदालतें करते रहते हैं और जन अदालतों के माध्यम से अपने फैसले लेते रहते  हैं.

निष्कर्षत: आम आदमी पार्टी द्वारा अपनाया जाने वाला प्रयोग एकदम नया व अपने किस्म का अनूठा नहीं कहा जा सकता.

Saturday, January 19, 2013

राहुल गांधी के लिये :: अभी नहीं तो शायद कभी नहीं


कांग्रेस के दो दिवसीय चिंतन शिविर के कई महीनों पहले या यों कह लीजिये वर्षों पहले से यह मांग उठती रही है कि राहुल गांधी को पार्टी या सरकार में कोई बहुत बड़ी भूमिका दी जानी चाहिए.कांग्रेस में उनके समर्थक यह भी कहते थकते नजर नहीं आते कि उन्हें देश के भावी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में घोषित कर उनके नेत्रत्व में ही २०१४ का लोकसभा चुनाव लड़ा जाए.कांग्रेस में ऐसा है भी कौन जो न चाहते हुए भी उनकी उम्मीदवारी का सार्वजनिक रूप से विरोध कर सके या कह सके कि राहुल गांधी के नेतृत्व में अभी तक ६-७ विधान सभा चुनाव लड़े जा चुके हैं तथा ऐसा कुछ भी हासिल नही हुआ जिसकी उम्मीद की जा रही थी.

वैसे तो राजनीति में कुछ भी नही कहा जा सकता कि कब कौन सा गणित काम कर जाए.कभी कभी सारे गणित फेल हो जाते हैं और कोई नया ही परिदृश्य उभर कर सामने आ सकता है,परन्तु एकदम किसी अप्रत्याशित घटना को छोड़ दिया जाए तो राजनीति की पारी क्रिकेट की पारी की तरह अनिश्चितता भरी भी नहीं होती है.अभी अभी जब मैं इस नोट को लिख रहा हूं तभी यह समाचार आ गया है कि राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाया गया है.

अत:सर्व प्रथम मैं उन्हें कांग्रेस की नंबर दो की कुर्सी औपचारिक रूप से मिलने की बधाई देता हूं.जहां तक उन्हें औपचारिक रूप से नंबर २ की कुर्सी देने की बात है,वे तो पहले से ही पार्टी में दूसरे नंबर पर थे.इससे कांग्रेस को कितना नफा या नुक़सान होगा, इस पर कोई भी राय व्यक्त करना जल्दबाजी होगी.सोनिया गांधी,कांग्रेस के कई नेता व स्वयं राहुल गांधी भी यही चाहते हैं कि वे देश के प्रधान मंत्री बनें.प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह जी ने भी कई बार उन्हें केंद्र में मंत्री पद देने की इच्छा व्यक्त की थी पर राहुल गांधी स्वयं ही इसके लिये तैयार नही हुए या इस तरह का आत्मविश्वास नहीं दिखा सके.

कार्य समिति की बैठक के फैसले के पहले कयास लगाए जा रहे थे कि राहुल गांधी को कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जा सकता है या कोई बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी जा सकती है. एक तटस्थ और निष्पक्ष  विष्लेषक के रूप में मेरी अपनी सोच कुछ और थी.मैं सोचता था कि बेहतर होता कि कांग्रेस पार्टी अपने चिंतन शिविर का लाभ ले कर राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद पर सुशोभित करने का निर्णय ले लेती.इससे एक तो प्रधानमंत्री जी, जो बहुत खुले तौर पर निर्भीकतापूर्वक अपने पद का निर्वाह और सदुपयोग नही कर पा रहे हैं उन्हें भी आराम करने का मौका मिल जाता और वे एक कुशल अर्थ शास्त्री के रूप में देश की सेवा कर सकते तथा राहुल गांधी एक तो यू.पी.ए २ के बचे हुए कार्यकाल में प्रधानमंत्री पद पर रहते हुए देश के सामने वर्तमान में उपस्थित विभिन्न चुनौतियों से निपटने में अपनी क्षमता व कुशलता का परिचय दे पाते और आगामी लोकसभा चुनावों में बेहतर भूमिका निभा सकते.शायद यह उनके लिये और कांग्रेस पार्टी के लिये अच्छा मौक़ा था और जनता भी उन्हें कम से कम एक साल तो परखने के लिये देती ही.भविष्य में पता नहींवे प्रधान मंत्री बन पायें या नहीं या फिर आडवाणी जी की तरह पी एम इन वेटिंग ही रह जायें.

जो भी हो,अभी भी उनके लिये मौक़ा है कुछ कर दिखाने का. वे दिखा सकें कि उनके पास कौन सी नीतियां हैं,कौन सी राजनीतिक सोच है.कौन सा करिश्मा है.कौन सा जोश है कि वो देश को कोई नयी दिशा दे सकते हैं.यदि अभी नहीं तो शायद फिर कभी नहीं.

Tuesday, December 18, 2012

पदोन्नति में आरक्षण से लाभ किसे ?


राज्य सभा में पदोन्नति में आरक्षण विधेयक पर वोटिंग से सभी राजनीतिक दलों ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है।वोट की राजनीति के अतिरिक्त देश की,समाज की किसी को चिंता नहीं  है। हर दल को इस बात की चिंता रही है कि विधेयक के समर्थन या विरोध से कहीं उसका वोट बैंक न खिसक जाए।उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ही मुख्य लड़ाई थी जहां मायावती अपने दलित वोट को मजबूत करने विधेयक का समर्थन कर रही हैं तो मुलायम सिंह यह जानते हुए कि  मायावती के दलित वोट को तो विधेयक का समर्थन करने के बावजूद भी अपने पक्ष में नहीं किया जा सकता विरोध में डटे हैं ।उन्हें विशवास है कि  इस विधेयक का विरोध करने से उनका ओ बी सी वोटर विशेष रूप से यादव समुदाय तो उनके साथ बना ही रहेगा तथा आरक्षण  विरोधी सवर्ण समाज भी उनके साथ आ सकता है।आरक्षण में मुस्लिमों को जोड़ने के हिमायती मुलायम सिंह रहे हैं।ऐसे में यह माना जा सकता है कि आरक्षण विधेयक का विरोध करने से मुलायम सिंह की पार्टी को उत्तर प्रदेश में बसपा की अपेक्षा थोड़ा लाभ हो सकता है।बसपा को न कोई लाभ होगा न नुकसान,पर कांग्रेस और भाजपा को विधेयक के समर्थन से कोई लाभ होता दिखाई नहीं  देता।अब जनता इतनी मूर्ख नहीं रह गयी है कि वह बातों को न समझे।यह बात अलग है कि  राजनीतिक दल उसे मूर्ख समझ कर अपनी कुटिल चालें चलते रहते हैं।पदोन्नति में आरक्षण से यदि लाभ होगा तो केवल उन दलितों का होगा जो नौकरी में हैं या रहेंगे।जो नौकरी में ही नहीं हैं उन्हें किस तरह से लाभ होगा?आज देश में आरक्षित वर्ग का भी 90 फीसदी से अधिक गरीब व सामाजिक रूप से पिछडा तबका जो नौकरियों के लिए अपेक्षित शिक्षा प्राप्त न होने के कारण आरक्षण के बावजूद नौकरी नहीं पा सकता,पदोन्नति कहां से पायेगा?बचे लगभग 10 फीसदी जो दलितों में भी सम्पन्न होने के कारण अच्छी नौकरियां पा सकते हैं उन्हीं के वोटों पर राजनीति करते देश के भविष्य व सामाजिक न्याय को ताक पर रख राजनीति करने तुले हुए हैं ये राजनीतिक लोग,जिन्हें न तो स्वयं नौकरी करनी है न ही अपने पुत्र पुत्रियों को कोई छोटी मोटी नौकरी करानी है। बस समाज के विभिन्न वर्ग इन लोगों की वजह से आपस में लड़ते रहें और सामाजिक सदभाव कभी पैदा न हो सके तथा ये लोग अंग्रेजों की फ़ूट डालो और राज्य करो की नीति का अनुसरण करते रहें

Friday, July 27, 2012

Blogs in Blogger not found ?

I can't find my blog in search engines. Has blogger changed its policy for free bloggers?

Thursday, May 17, 2012

Our Next President

 
If a tribal becomes the president it is all right and welcome. But there should not be any precondition that the president must belong to a particular class or society.Whoever is most deserving and acceptable to all must be the president.The highest position should not be confined to narrow lines of caste,religion,creed,gender etc.

Saturday, April 21, 2012

Why People go to so called BABAs ?

जब लोग अपनी मेहनत और ईमानदारी का रास्ता छोड़ कर सरल तरीकों से बहुत अधिक धन कमाना या अन्य इच्छाएँ पूरी करना चाहते हैं तो उन्हें कथित देवी देवताओं और चमत्कारिक बाबाओं की शरण में जाना ही पड़ता है. यह सभी को मालूम है कि यदि ईश्वर कहीं है तो वह केवल इंसान के अन्दर ही है. चमत्कारिक बाबाओं को प्रचारित प्रसारित करने में हमारी सरकार की नीतियाँ व मीडिया भी उतने ही जिम्मेदार हैं जितने अन्धविश्वासी लोग.शायद कोई विश्वास न करे,मैंने जब से होश सम्भाला है,कभी ईश्वर से भी अपने स्वयं के लिए कुछ नही माँगा,इंसान या किसी चमत्कारिक बाबा से माँगना तो बहुत दूर की बात है. आज विज्ञापन का युग है तथा बेवकूफ बनाना भी एक कला है.जो दूसरों को जितना अधिक बेवकूफ बनाने में सफल हो जाए वही आज के युग में उतना ही अधिक बुद्धिमान है.शायद ही जीवन का कोई ऐसा क्षेत्र हो जहां इस बेवकूफ बनाने वाली कला का धड़ल्ले से उपयोग नही किया जा रहा हो.धर्म और अध्यात्म का क्षेत्र भी इस कला से अछूता नही है. विभिन्न उत्पादों के टी.वी. आदि में प्रसारित विज्ञापन भी यही कार्य कर रहे हैं. कोई क्रीम एक हफ्ते में भैंस को गोरा बनाने का दावा करती है तो कोई दवा असाध्य रोगों को शर्तिया ठीक करने का दावा करती है.ऐसा शायद ही कोई उत्पाद हो जो विज्ञापन में बताये गए दावों पर पूरा तो क्या आंशिक रूप से भी खरा उतर सकता हो.जिन बाबाओं को धन और यश कमाने की इच्छा रहती है वे भी इसी प्रकार प्रचार माध्यमों का सहारा लेते हैं. जिन्हें वास्तव में ईश्वरीय शक्तियों से थोड़ा बहुत भी कुछ प्राप्त हो जाता है वे प्रचार से बहुत दूर हिमालय की कंदराओं में शान्ति की खोज में लगे रहते हैं तथा जिन्हें ईश्वर की कृपा से कुछ सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती है वे धन संग्रह ना कर अपना जीवन परमार्थ व जनकल्याण के लिए लगा देते हैं.

Friday, March 30, 2012

संसद बनाम टीम अन्ना

विशेषाधिकार नोटिस के जवाब में अरविन्द केजरीवाल ने जो कुछ कहा है मैं उसका पूरी तरह से समर्थन करता हूँ. किसी को सम्मान देना या न देना व्यक्ति का मौलिक अधिकार है तथा किसी भी व्यक्ति को इसके लिए बाध्य नही किया जा सकता.सम्मान माँगने से नही मिलता बल्कि जो इसको पाने का हक़दार है उसे स्वयं ही मिल जाता है. क्या आज देश के अधिकांश राजनीतिज्ञ इस सम्मान को पाने के हकदार हैं ? नहीं. १९४२ के भारत छोडो आन्दोलन के दौरान महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का नारा दिया था. आज ७० वर्षों बाद यह "करो या मरो" का नारा एक बार फिर दोहराने की जरूरत है. उस समय की मांग थी "अंग्रेजों भारत छोडो". आज की माँग है " भ्रष्टाचारियो व अपराधियों संसद छोड़ो ". जब तक संसद में बैठे हुए भ्रष्ट व आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को अच्छे,ईमानदार व स्वच्छ छवि वाले व्यक्तियों से प्रतिस्थापित नही कर दिया जाता तब तक लोकतंत्र के इस पवित्र मंदिर की पवित्रता व सर्वोच्चता को पुनर्स्थापित कर इसका खोया हुआ सम्मान वापस नही लौटाया जा सकता. यह काम केवल टीम अन्ना का ही नहीं बल्कि संसदीय लोकतंत्र में आस्था रखने वाले हर भारतीय नागरिक का यह कर्त्तव्य है कि अपराधियों और भ्रष्ट आचरण वाले लोगों को संसद और विधान सभाओं से बाहर खदेड़ने के पुनीत कार्य में अपना हर संभव पुरजोर सहयोग करें.
भारत माता की जय.
!!!जय हिंद !!!

Tuesday, March 20, 2012

Increasing retirement age of professors

CHHATTISGARH ASSEMBLY : CHIEF MINISTER DECLARES RETIREMENT AGE OF TEACHERS IN HIGHER EDUCATION WILL INCREASE FROM 62 TO 65



सेवारत कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ाने की मांग हमेशा होती रहती है तथा सरकारें भी अपनी सुविधानुसार आयु सीमा में वृद्धि करती रहती हैं. संसद और विधान सभाओं में बैठे राजनीतिक लोगों को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से चर्चा करने की आवश्यकता महसूस नही होती.जो लोग अपनी सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने की मांग करते हैं व मांग मंजूर होने पर खुश हो कर एक दूसरे को बधाई देते हैं वे शायद यह नहीं सोचते या अपने निहित स्वार्थ के कारण सोचना नहीं चाहते कि ऐसा करने से बेरोजगारी की लम्बी कतारों में लगे नवयुवकों को क्या नुकसान होने वाला है. उन्हें और इंतज़ार करना पडेगा तथा कई नवयुवक सेवानिवृत्ति की आयु सीमा बढ़ जाने के कारण सेवा में भरती की उम्र ही पार कर जायेंगे. दुर्भाग्य की बात यह है कि नवयुवकों के हितों की बात करने वाला कोई भी संगठन इस बारे में नही सोचता.यहाँ तक कि छात्रों की ओर से भी इस प्रकार की बात नही उठती कि सेवारत व्यक्तियों की आयु सीमा बढ़ने से उनके भविष्य पर विपरीत असर पडेगा.
उच्च शिक्षा में आयु सीमा बढ़ाने के पीछे सरकार शिक्षकों की कमी को आधार बनाती है पर नए शिक्षकों की भरती के लिए कारगर कदम नही उठाती.यदि कार्यरत शिक्षकों की सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने के स्थान पर नई भर्तियाँ की जाएँ तो जहाँ एक ओर बेरोजगार नवयुवकों को रोजगार मिलेगा वहीं सरकार पर आर्थिक बोझ भी कम पड़ेगा. सेवानिवृत्ति के समय अपने वेतन के अधिकतम पर रहने वाला व्यक्ति नई भर्ती वाले व्यक्ति से लगभग चार गुना वेतन पाता है ,ऐसे में एक व्यक्ति के वेतन में चार नई नियुक्तियां की जा सकती हैं.वैसे भी ६२ वर्ष की आयु प्राप्त करते करते अधिकाँश व्यक्तियों की शारीरिक क्षमता ,पारिवारिक जिम्मेदारियों तथा अन्य कारणों से अपने कर्त्तव्य के प्रति रूचि कम हो जाती है, जब कि नया व्यक्ति पूरे उत्साह,क्षमता व ऊर्जा से कार्य करता है. यह भी उल्लेखनीय है कि सेवानिवृत्ति की आयु में वृद्धि की मांग करने वाले कई व्यक्ति तो ऐसे होते हैं जिन्होंने अपने सेवाकाल में अपने मूल कर्त्तव्य को प्राथमिकता ही नहीं दी .ऐसे लोग बढी हुई आयु सीमा में क्या कुछ कर पायेंगे ? सरकारें शिक्षकों की कमी से निपटना ही चाहती हैं तो वे कर्तव्यनिष्ठ ,योग्य व सक्षम शिक्षकों को आवश्यकतानुसार पुनर्नियुक्ति या संविदा आधार पर नियुक्ति दे सकती है.

Wednesday, January 4, 2012

AIM OF TEAM ANNA ?

First of all Team Anna must decide what is their ultimate aim.If they want to fight corruption and want a change in the system they should concentrate on awakening the people to vote for good and honest persons.They must also understand that in present political system where all the political parties are more or less the same,opposing any particular political party in the elections means supporting the other corrupt party. By doing so they will be blamed to have a political agenda and their movement will loose ground.Also in parliamentary democracy parliament is supreme so long as law making is concerned and no Govt will accept all the demands of opposition whether the agitation is led by a political party or any social activist.A change in system can be achieved by ballot only.If people are really awakened they will vote for good persons only otherwise it is of no use wasting time and energy.Till date common people believe that they (team Anna) don't have any hidden political agenda,though political leaders trying their best to prove them brand ambassador of a particular party. or organisation.If they want a political change they must form a joint forum of like minded persons and field their own clean independent candidates in parliamentary elections otherwise they should concentrate on social issues only like prohibition,dowry,saving girl child ,population control etc.

Tuesday, December 27, 2011

कमजोर लोकपाल, पर शुरुआत अच्छी ...

किसी भी जन आन्दोलन में लगातार एक सी भीड़ नही रह सकती.यह बात तो आन्दोलन की अगुवाई कर रहे लोगों और समर्थकों को समझ में आनी ही चाहिए.सरकारें इसी तथ्य का लाभ उठाने के लिए आन्दोलनों को लंबा खींचने का प्रयास करती हैं.वैसे भी यह सर्व विदित है कि प्रजातंत्र में कानून संसद में ही बन सकता है .सामाजिक आन्दोलन क़ानून के प्रावधानों में बाहर रह कर एक हद तक ही प्रभावी हस्तक्षेप कर सकते हैं.ऐसा लोकपाल मामले में भी हो रहा है.यह अन्ना हजारे के आन्दोलन का ही प्रभाव है कि आजादी के चौंसठ वर्षों बाद तथा पूर्व में नौ बार संसद में रखे जाने के बावजूद पारित न हो पाने के बाद इसे लोकसभा ने पारित किया है.अभी भले ही यह कमजोर लोकपाल है लेकिन एक बार संसद की मुहर लग जाने के बाद इस क़ानून में संशोधनों के रास्ते खुले रहेंगे.अभी तो यह देखना बाक़ी है कि राज्य सभा में ऊँट किस करवट बैठता है क्योंकि राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत नही है.जो भी हो कमजोर ही सही, इसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है.वैसे भी किसी कानून द्वारा भ्रष्टाचार पर पूरी तरह रोक लगा पाना संभव नही है.उसके लिए हर व्यक्ति को अपने स्तर पर कार्य करना पडेगा.सामाजिक नेताओं को आन्दोलनों के अतिरिक्त पूरे देश में जन जागरण अभियान चलाना पडेगा तथा जनता को भी यह अच्छी तरह समझना पड़ेगा कि वह चाहती क्या है ? हमारी लड़ाई दूसरा कब तक और क्यों लड़ता रहेगा ?

Wednesday, December 21, 2011

Why waste money to hire ground for people's agitation ?

I think Govt is not going to take any action on the basis of Anna's third agitation.They have made a prestige point not to accept most of the provisions suggested by civil society in its prepared Janlokpal.Govt neither intends to keep CBI under Lokpal nor interested in giving autonomous constitutional status to the CBI.In democracy political parties make their strategy keeping votes in minds. UPA cabinet has already cleared the food security bill and they presume to have secured the votes of poor and are assured to come in power again like some states got advantage of cheap food grains for poor in the past. So they are not much worried about the impact of Anna's agitation on their votes.Some states are trying to give benefit of reservation to scheduled tribes or Muslims or taking some other populist steps just to get the votes. Team Anna doesn't have any vote catching power as they have not to contest any elections. They can at the most campaign against congress and what will be the effect of their appeal on voters can't be predicted as of now. In Hissar it was a question of only one constituency , that too the defeat of congress candidate was predetermined there. I don't think a pro or anti campaign can be run in a general election without a very strong organization because at the time of voting the voters have many issues and priorities except corruption including corrupt practices. Everyone in the crowd supporting Anna is not honest .Corrupts also support his agitation with their own vested interests. The so called intellectuals and awakened persons are more dangerous because they know how to manipulate the things in their favor.They will be with Anna till their interests do not suffer.After a symbolic final agitation of 3 days Team Anna will have to undertake rigorous awakening campaign throughout the country from grass root level if they really want a change in the political and social system of our country. The symbolic agitation and "Jail bharo" can be led from any place even from Ralegan Siddhi without wasting lacs of rupees to hire a ground in Delhi or Mumbai.

Sunday, November 27, 2011

Anna's fresh agitation for Janlokpal !

Hope Anna Ji will not be compelled to launch a fresh agitation for Janlokpal bill and a strong lokpal bill in line with Janlokpal bill is passed in current session of Parliament.In case the bill is not passed or a weak bill is passed the agitation must be quite systematic,planned and more strong than the last two agitations.This time if fast is observed at Ramlila Ground or at any other place in Delhi it should not be for more than 48 hours that too just to create an atmosphere all over the nation.The very next day of end of fast there must be a mass silent rally in Delhi and in every district,city and villages.Thereafter peaceful awakening programs throughout the nation must be conducted without any appeal to the Govt or political parties to accept our demands.No allegations on any of the dumb and deaf political parties for not passing the bill.In the mean while India Against Corruption movement must be turned in to a registered legal body and membership to be given to the persons believing in IAC's laid down principles on a nominal annual membership fee of Rs 10 with a target of 200 million members. It should be carefully observed that no selfish and ambitious person who could take advantage of India against corruption in his or her vested interests is given the membership of IAC.By mistake if some member is included and it comes to know at a later date he/she must be ousted with immediate effect.Membership campaign must be done at the grass root level from remote village to the Metros.Once the membership campaign is over peaceful meetings and training programs to the members must be conducted throughout the nation to prepare people's mindset to change the prevailing corrupt system.People must be able to understand and realize that the anti corruption crusaders are not struggling for their own benefits or to achieve something for themselves but sacrificing their ambitions and other things for a corruption free nation.To run the whole program working committees must be formed at every level and if any member found working against the principles of the movement must be expelled.People want a change in the system and let them decide if they really want a change ?

Tuesday, November 8, 2011

Janlokpal:Wait for winter session of parliament.

I think team Anna must have been tired with their hectic tours. The Janlokpal issue is so publicized and deep rooted in the minds of people that it does not require any more publicity at this stage. So far as pressure building is concerned Govt is already under pressure and is well aware of the repercussions of not passing the Janlokpal Bill in winter session of parliament.Let us wait for the winter session. The overwhelming support against corruption and for Janlokpal was self motivated and now there are two clear schools of thoughts, one supporting a strong lokpal bill and the other opposing it. The supporters are ready to mobilize again whenever a call is given by Anna Hazare, the sole leader of Janlokpal movement. It is true that a single person can’t lead and run any nationwide agitation all alone and a well organized team is always required but the team should not invite many controversies. Allegations, counter allegations and more clarifications may divert peoples mind, the opponents are already trying their best to divert and dilute the issue. I suggest team Anna to take some rest and wait till winter session of parliament. During their leisure they can plan and well organize themselves for future agitations. If a strong Lokpalbill is not passed in the winter session of parliament fresh agitation must be started and supporters are prepared to fight and win the battle.

Sunday, October 30, 2011

पहली प्राथमिकता जनलोकपाल बिल

हमारी पहली प्राथमिकता जनलोकपाल बिल पारित करवाना है तथा इंडिया अगेंस्ट करपशन के सभी सम्मानित सदस्यों को एक बात समझ लेनी चाहिए कि हमें हमारे सेनापति अन्ना हजारे जी की तरफ से जो भी निर्देश प्राप्त होते हैं उनका अनुशासित सेना के सदस्य की तरह पालन करना है.अन्य मुद्दों पर जनलोकपाल के पारित हो जाने के बाद भी बात हो सकती है.यह समय आलोचना व प्रत्यालोचना का नहीं है,बस एकजुटता बनाये रखनी है और आन्दोलन को सफल बनाना है. स्वतंत्र भारत में इतना बड़ा व इस प्रकार का आन्दोलन पहली बार हुआ है जिसमें देश के हर कोने से हर जाति,धर्म,विचारधारा व आयु वर्ग के स्त्री-पुरुषों ने स्वत:स्फूर्त सक्रिय सहभागिता निभाई हो . हमें छोटी-मोटी खामियों की तरफ ध्यान नही देना है. हर आन्दोलन की सफलता उसके समर्पित व कर्मठ कार्यकर्ताओं पर निर्भर करती है.

Friday, October 28, 2011

अन्ना हजारे का आन्दोलन

जब भी कोई बड़ा आन्दोलन चलता है तो उसमें छोटी मोटी खामियाँ रह ही जाती हैं.अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार के विरुद्ध चलाये जा रहे आन्दोलन में विभिन्न विचारधाराओं के लोग जुड़े हुए हैं. ऐसा भी नहीं है कि इस आन्दोलन से जुड़ा हुआ हर व्यक्ति पूरी तरह से ईमानदार ही है.हर मकसद से लोग जुड़ते हैं,कुछ लोग इसका भी अपने निजी स्वार्थ हेतु प्रयोग कर सकते हैं और कर भी रहे हैं. कुछ लोग भावनात्मक रूप से जुड़े हुए हैं तो कुछ लोग अन्य कारणों से.यह तो तय है कि लोग चारों ओर व्याप्त भ्रष्टाचार से त्रस्त हो गए हैं तथा उस से मुक्ति चाहते हैं . अत: हमें आन्दोलन को सफल बनाने की तरफ ही ध्यान केन्द्रित करना होगा.सबसे पहले तो उन लोगों को जो निःस्वार्थ भाव से देश हित में इस आन्दोलन से जुड़े हैं यह करना पडेगा कि आन्दोलन की खामियों को बढ़ा चढ़ा कर सार्वजनिक रूप से प्रचारित प्रसारित न करें क्योंकि विरोधी तो पहले से ही चाहते हैं कि आन्दोलन सफल न हो.ऐसा करके हम विरोधियों को ही उनके मकसद में कामयाब होने में मदद करेंगे.दूसरी बात यह कि जो लोग पहले से कोर कमेटी के सदस्य रहे हैं और किन्ही कारणों से कोर कमेटी से अलग हो रहे हैं उन्हें भी अलग होने के बाद टीम अन्ना के दूसरे सदस्यों पर आरोप प्रत्यारोप से बचना चाहिए,अन्यथा उनकी स्वयं की आन्दोलन के प्रति निष्ठा सवालों के घेरे में आ जाती है. कोर ग्रुप की बैठकों में हर मुद्दे पर खुलकर बहस की जा सकती है.राष्ट्रहित में चलाये जा रहे आन्दोलनों में व्यक्तिगत अहम् व महत्वाकांक्षा का परित्याग कर त्याग की भावना से ही कार्य करना पडेगा.तीसरी बात यह कि अन्ना हजारे जी या उनकी टीम के सदस्यों को भी हर व्यक्ति की बातों पर सफाई देने या उनकी बातों का जवाब देने की आवश्यकता नही है.हाँ यदि माननीय प्रधान मंत्री जी या उस स्तर के किसी व्यक्ति ने कोई आरोप लगाया हो तभी ऐसे किसी आरोप आदि पर बड़ी ही शालीनता से अन्ना जी के स्तर पर ही सफाई या जवाब दिया जाना चाहिए.अन्य लोगों को तो केवल आन्दोलन को सही ढंग से चलाने में ही रूचि रखनी चाहिए.चौथी और अंतिम बात यह कि अन्ना हजारे जी की कोर कमेटी के विस्तार किये जाने की बात से मैं सहमत हूँ.मेरा मत है कि कोर कमेटी में हर राज्य से कम से कम तीन सदस्य रखे जायें तथा वे सदस्य ऐसे हों जिनका चरित्र पूरी तरह से बेदाग़ हो ताकि उन पर कोई उंगली न उठा सके.हमें यह भी याद रखना चाहिए कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई कुछ दिनों,महीनों या वर्षों में समाप्त होने वाली नहीं है,यह तो भ्रष्टाचार के समूल निवारण तक अनवरत रूप से चलती रहेगी तथा इस संघर्ष में कई लोगों को अपने प्राणों तक की आहुति देनी पड़ेगी..जय हिंद !!

Thursday, October 27, 2011

Digvijay Singh's statements will help congress ?

I don’t know what prompts Digvijay Singh Ji to issue such statements. He is a senior congress leader having quite a long political experience. He should talk against his political opponents and the like minded persons will certainly appreciate his statements hitting his political opponents. But he must remember it is not only the members or sympathizers of a particular political party ensuring win in any election. The role of politically neutral or impartial floating voter is much more and becomes a deciding factor. As an impartial political analyst I am compelled to believe Digvijay Singh Ji himself is damaging congress more than any one else. May be he has some hidden agenda out of frustration. In Hindi a proverb is generally used “Na khud khayenge,na kisi ko khane denge”(neither we will eat nor will allow anyone to eat).May be he is moving on same line for congress itself,otherwise he is congress general secretary like a general of an Army. Any intelligent general will never like to open many fronts at a time. No Army whatever strong may it be, can win a battle fought in many fronts simultaneously. If he speaks against or abuse every political party, every social activist, every religious leader and every spiritual leader who will support him or his party? Even in congress every one is not his follower and there are many party members who don’t like his everyday statements. May be congress high command too is unaware of the damage he is causing to the party.